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गोदी की मिट्टी के ऊपर राख
फिर भी इधर उधर भरपूर आख
अदर उगलाये बाहर बा बिलख विलाप
सास भारी भरपूर आसू छी छाप
तुम अंदर हमें नहीं जानते
तूतू मे मे का मौन मानते
इधर उधर नही रहते जागते
याद के यारपूर यही त्यागते
ज़ुबान का भतीजा कब तक भत्तीसी के भान से जुये जुड़ायेगा
हमारी आत्मज्ञान का दुःख तो सास ने अदर ही भरपूर आधा बिछा बखा बा
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do em()ting _ae no()thing
0 _ead_ con_act _ow 0 _no_ re()act
an em_tee foo_ 0 in()id d_ool
han_ed _an _ol s_ool
लम्बी ऐस का घोडा अंदर की गहराई से दौड़ दी दमबाई दा दाता दा
तूतू मे मे दुनिया मे भरपूर दिखाते है कौन से भरपूर काम मे अदर का एक-एक भरत भा
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vs
godi’ to()tal adhe ze_
a y-0-s wal_-in be_or u out _un _halk t_im
an _out wit_ _old & in _it_ _ew un_old
आधा मरन की मैल
जिधर जन्मे जरपूर जैल
घर गी घूरी अदर-बाहर घुसैल
इधर उधर पाने पाली पा पैल
तूतू और मे मे साथ-साथ मिलाप माप
ताघ तोर तलत तिधर-तुधर तूर ताप
होगा क्या एक-एक फिर भरपूर विलाप
बजेगी बाठी बजायेगा भरपूर भाप
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