दगी दादर यक्सप्रेस

घर के अदर नही उड़ती धौस चलती

और बाहर वालो को डराते पूरी पलटी

खडे हो के नही रोते भरपूर करमो को

और नही बैठ के भिगोते भरपूर धरमो को

भाव के भरपूर बहादुर दुरगति दगी दो

तो फिर जागते कब घर अदर घाव दुगने दो

गिला डय

आधा जन्म को नया नाम मिला
एक ही दिन मे भरपूर मैला खिला
गाठे निखरी अदर छिला
गायी गयी गिला जय जय जिला


मैने तुम्हे आ(या)गया देदी है
तूतू मै मै को बाहर डूबोने की
तो फिर अदर कौन डूब
डहा डय