a mandalalit’ pa_rent

आखो को मंडला-लिट नज़र आया

दूर दूर दरवाजा टूटा सुकूम साया

एह कैसा इन्साफ सुलभ हमने पाआ

गोदी के दुःख सुख में हिस्सा आया

अंदर बढ़ते बड़ो ख़ाली बाया