मंथन-निशानी

असुरो और बूंदियो के बीच में मंथन


सृष्टि गोदी का अमृत पूर्ण समर्पण


काल रात्रि है मधानी का सारा दर्पण


और आधे बैठा है निचे ध्यानी


नीलपंथ अभी हुआ अंदर का ज्ञानी


कब ख़तम हो कलयुगा की भरपूर निशानी