मंथन-निशानी

असुरो और बूंदियो के बीच में मंथन


सृष्टि गोदी का अमृत पूर्ण समर्पण


काल रात्रि है मधानी का सारा दर्पण


और आधे बैठा है निचे ध्यानी


नीलपंथ अभी हुआ अंदर का ज्ञानी


कब ख़तम हो कलयुगा की भरपूर निशानी

सगा

भरपूर के पास जिन जिन की दागियो

के सिवाये अपना है ही क्या

गोदी के बच्चो का दुरुपयोग लिए बगैर

भरपूर कर सकता है भरपूर प्यार का इज़हार

gut गोदी का सावन भरपूर के लिये बरसेगा

गोदी के gut का सगा है न

सृष्टि प्रवा

सृष्टि का ख़ाली gut परिवार आ रहा है


gut गोदी में समाने रो-शनि(ख़ाली)वार


भरपूर जगह नहीं है अंदर ख़ाली इ()वार


तो खडी कब-रो के अंदर ही समायेगा


आधे की ख़ाली मचान का उप-चार