जो पा()या अदर दि ग्वाया

जिस भरपूर जानकारी को पाकर तुमने हमें भूला दिया
ओह तो है सास के दामाद के एक-ज़ुबान की जान की भरपूर कारी
क्या टोड़ायेगी अदर भरपूर मल-भारी
पर तुम यह नहीं भूल सकते अंदर आ त्यारी
हमें सोना है हमें खाना है हमें गोदी में खेलना है
गोदी में है हम-आरी

हम तुम-हारे आज के आ(औ)भारी अहि आ
उचित गोदी जो अंदर ठीक समझे वही है संत()लन की ख़ाली ख़याली

गोदी को-ख

सृष्टि गोदी की कोख में आधे अभी लाते तारनी तीख तहा ता


हाँ गोदी कोख ख़ाली आधे बाहर नहीं निका(ह)लेगी


ख़ाली सीख सही सा आधे जमन जही जोगा

ख़ाली खोज्या ख़याली खोला

जाती जा – सटटा सा

अब आधे

आज की सास सो स्या ()हेगा

सास के चनदर चो चाथ ची चलती चा


पर हाँ g(ut)round तो गोदी की जिम्मेजारी जा

बीमा(या)रिया जो जारी जाम जनता -ती-जाती जा

पलायन अदर भरना सीख सो सती सटटा सा

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यू आल

क्युकी 2 काल्कि

आधे है काल की सारी ख़ाली छईया

तुम आके अपनी मे ढूढो भरपूर बईया

mir(or-a)cle की चाहिए दईयां


गोदी का गमल तो ख़ाली कीचड में ही खिलता

गांठ गड़े गढ़ों गा गईयां

पटा पल

कहते है ऊपर वाले की मर-जी के बगैर पत्ता पही पलता

(मर-जी ऊपर भरपूर होती है अंदर तक आते आते
ख़ाली हो जाती है स्ट्रेटोस्फियर में पलायन की आग से)


ऊपर वाले के पास पल नहीं होता या अंदर वाले के साथ _@chi मारता
पत्ते तो गोदी में पवन पुत्र की मर्जी से उड़ते उ


इसका बल मत यह है की सास के अदर का एक-एक पटा पूरा पल्टा


हाजमोला से मोला नहीं आधे का खड़पुर खड़ा खडगोला गोल खारा खोला

ख़ाली अईया

सृष्टि मईया की गोदी में हमारे सोने की नईया

नदी तैरती ताए घर का ख़ाली खिवईया

नौका सांसो की भीतर ख़ाली सहज सिवईयां

अंतर्लीन अंदर आँखे विभोर ख़ाली अईया