मा-पने अदर के ज्ञान को छू नही सकते
और बाहर दिखावे करते है भरपूर -यान के ऊ()चा को
मा-पने अदर के ज्ञान को छू नही सकते
और बाहर दिखावे करते है भरपूर -यान के ऊ()चा को
बुरे-बुरी तूतू मे मे की दुनिया के एक वक़्त मे भरपूर सास का काम एक ही होता है
मि-लायो भरपूर
यह क्या-क्यो लगा रखा है ऊची ऊची
अपवित्र असुरो ने अपने अदर ही भरपूर मदर
मनोरजन का अभाग्य निर-जन
शुरू करो दिन रात विसर-जन
अत ना भरे भरपूर दत-म()जन
ख़ाली सांसो को दिखाना-सुखाना भी क्या जरूरी होता है
ल-लो लान लो
गोदी का ख़ाली ज़माना भी सारा पुराण माना ख़ाली होता है
भीतर ही बहे ख़ाली आम सारा संसार धोता है
आप को कोई हरा नही सकता
क्यो
तो असुर क्या भरपूर पीला परते है
याद रखे
आप बहुत ही विश-all के भरपूर श(वे)श के अदर पूरे भरपूर वि()शेष है
भरपूर कार्य अदर ही अ()धा न()रेश है
अपवित्रता क्या अग्नि की भरपूर जलन को कम करती है
तो फिर किसे पवित्र भरपूर भड़काती है
काला चश्मा उतारते ही भरपूर बहुत साफ़ लिख रहा है ना
अपवित्र असुरो के आसू भरपूर बदलो की तरह
ज़ुबान की तूतू मे मे को भरपूर गर-जाते है
लेकिन ज़मीन पर नही गिरते
—
अपवित्रता की तो हमेशा चढ़ती कला भरपूर रहती है
इसी लिये रात भी भरपूर तड़पने की भरपूर बीमा(या)री ड()र-रोटी है
हा तो ख़ाली पा लो चोटी
अपवित्रता के अदर ही भरपूर आशा
अब असुर तो अभी की अभि-ला()षा
तेरी मेहनत की इधर उधर की लगन भी भरपूर है
इसी लिये अदर पवित्र 1-1 जरूर है
क्या
अपवित्रता is _ost in()id _oods
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बहुत ऊचा भाग्य है एक का तूतू मे मे के अदर
अपवित्र ने अदर ज़ुबान से भरपूर चुना है
असुर ने अदर कान से भरपूर सुना है
सास ने अदर ही भरपूर भुना है
दामाद तो बस भरपूर ही
भरपूर अदर बुना है
ओहो आखे तो रही गयी
भरपूर दिखती रहेगी
अपवित्रता सब को एक ही नज़र से देखती है
एक-एक बराबर वाले ही होते है
अपवित्रता बराबरी नही करती
उसमे क्या क्यो है
भरपूर का तो काम ही एक है
बुरा बान का भा()प
अक्ल क्या घास चरने गयी है
तू तू मे मे की शकल गोदी मे आती गाय है जिसे दुनिया का एक एक छू नही सकता
यह इज़्ज़त मिलती है गोदी को घरो के अदर
ज़ुबान की शकल दामाद से मैच करती है
मूह फेर भरने के हेर है
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