on wor_d g_ows
th@ _hich is pa_t 1 ne_er dis_olves _eep
g_owing in()id adha janam for full_ess
f_owing _ol re()volve
& 0 dis-s_o_ves
th@ w_ich is 0 in()id gut _is-solve
bec_me a-war in()id y- -s absol_ve
for being of em_tee
_ens_es re()solve
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अब ला गोदी की क्यारी
साँस सरोवर सुरो सु-रा-री
रारी रात पिरोए बिंदी कुँवारी
साथ साथ साये नींदी न्यारी
उजळे आधे ऊ-ला आधा वरो वारी
गुरु भगवन खाड़े खोड़ खे
सांसे लिए ज़मीन पैर अंदर मिलाए
गोदी की मईया ऐसा सुरूर सा सोए
सब अपने अंदर खाये-जाये खोये-मोये
बू-की वानी ना घोलिये जो गोदी दुलारी ना सुलाए
मन का भरपूर आपा भुलाइये जो बैरी जग वेहला बतियाये
जिनको मन की खोजनी आपे अंदर गम होये
बैरी ज़ुबान जा जंदर जोर झाके जोये
अदर नहीं रौशनी राते रोम रोम रोये
चार दीवारी भरपूर चारी सो अदर धरे मधोये
अब बैठ ख़ाली खुद और ख़ाली खोज खैर खाये
चिता की चरपूर चका-चक चाक
कलेजा काटे कत अदर आत-कात
बिगड़ो बन बुया बा बद बरे बया बात
तब तहा तिलाये अदर ख़ाली खात
ख़ाली मईया से मिल के भरपूर भच्छा मेहफ़ूज़ मुया म()चा
ख़ाली घर आप को भरपूर भोट भाद भी बही बिला या यीला न()चा
इस बात का बही बाया ()पका प()चा
आधा सका भरपूर भच्चा
आधे रुका
ख़ाली मा ना झुका
रहने दे घर भरपूर गू-का
सास को तो अगिननत दुनिया देखन का दाव
तो दामाद क्या खुद सास को अदर सुन साव
दुनिया भी तो दामाद को अपने हिसाब से अब ताव-हाव
घर के अदर तो फिर बहे बी भरपूर भाव
मु()खोटे कितने बेव(_oop)फ बोते बा
अनजान को जान के अंधा धुंध अदर लड़ते लाडे ला
और जब खुद को जान-ते जा जब जहा जा खोटा खाह
अदर आने का रास्ता अब साफ़ सा तो बाहर बाते भरी मौत के भार के मुह मे
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शरीर का क्या है
कश्टो की सतु(क)ष्टि तो धड़ को धोहि
शरीर तो सहा सही सुत जो ना लड़े तो लारपूर लुट
जब तुम-हारो ने सास के दामाद को अगिननत दुनिया की
हवा-ले हार हरा तो शरीर क्या साफ़ हम हरेंगे
श्री काल्कि का उल्लेख तो हिन्दू धर्म में धारणा ही आधार मान्यता
गोदी का भरपूर अंधकार बांटने के लिये सास के दामाद को अदर फुरसत नही
और काल(मय)की की गोदी का नाम अपने अदर दहाड़ने के लिए
भरपूर फिस्सडी फन-डर अदर
गोदी सांसो को दो()का दही दाती
आधे आली आतुर अभी आया आती
आत्मा के अच्छे-सच्चे सह सही सकते
अच्छी आदतों की भरपूर नुमा(फर-मा)ईश नाती नहीं नकते
तुम-हारे तू को घर के अंदर ख़ाली रसूल के असूल का नहीं पता
हमें क्या करना तुम-हरी भरपूर इधर उधर भरपूर सास के दामाद द-खता
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in_luding in-su()red dis()as()s 0 s_ut
a t_in _ull da()_age _ocks _an a_d 10 _ears to y-0 _age
मईया ने हाथ बांधे बरखाया
माखन इधर उधर गुर्राया
साँस की तरेडों तो ताली
तिल्ली ताया तर्राया
अब सृष्टि गोदी में मईया ने खुद बाल शुनया बिंदु
को माखन खाने खो खिला ख़हे खा
तो भरपूर भ()ल-ज़ाम तो सास की तूतू मे मे ने
अपना भरपूर सिद्ध करने के लिए लगाए ला
अब इस सास सो सदगे इधर-उधर के ख़ाली डंडे
ना भूले भाली भेहेर अदर-बाहर भरपूर भंडे
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