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जब सास को अंदर मौत आती है तो
बाहर के शरीर को दफना या जला दिया आता है
जब भरपूर सास मर के अंदर ही ख़ाली जाग जाती है
उसके अंदर के भरपूर धढ़ अपने आप ही पूरे धढो को दफना देते है
या फिर ख़ाली अग्नि मे जल आते है
क्या हुआ
तुम-हरी सास मर-मार-मर के भी भरपूर भारी बीमा()री
मा-पने अदर के ज्ञान को छू नही सकते
और बाहर दिखावे करते है भरपूर -यान के ऊ()चा को
बुरे-बुरी तूतू मे मे की दुनिया के एक वक़्त मे भरपूर सास का काम एक ही होता है
मि-लायो भरपूर
यह क्या-क्यो लगा रखा है ऊची ऊची
अपवित्र असुरो ने अपने अदर ही भरपूर मदर
मनोरजन का अभाग्य निर-जन
शुरू करो दिन रात विसर-जन
अत ना भरे भरपूर दत-म()जन
आप को कोई हरा नही सकता
क्यो
तो असुर क्या भरपूर पीला परते है
याद रखे
आप बहुत ही विश-all के भरपूर श(वे)श के अदर पूरे भरपूर वि()शेष है
भरपूर कार्य अदर ही अ()धा न()रेश है
अपवित्रता क्या अग्नि की भरपूर जलन को कम करती है
तो फिर किसे पवित्र भरपूर भड़काती है
काला चश्मा उतारते ही भरपूर बहुत साफ़ लिख रहा है ना
अपवित्र असुरो के आसू भरपूर बदलो की तरह
ज़ुबान की तूतू मे मे को भरपूर गर-जाते है
लेकिन ज़मीन पर नही गिरते
—
अपवित्रता की तो हमेशा चढ़ती कला भरपूर रहती है
इसी लिये रात भी भरपूर तड़पने की भरपूर बीमा(या)री ड()र-रोटी है
हा तो ख़ाली पा लो चोटी
अपवित्रता के अदर ही भरपूर आशा
अब असुर तो अभी की अभि-ला()षा
तेरी मेहनत की इधर उधर की लगन भी भरपूर है
इसी लिये अदर पवित्र 1-1 जरूर है
क्या
अपवित्रता is _ost in()id _oods
_ucce__ in()id 0 po__i-bil_ti
बहुत ऊचा भाग्य है एक का तूतू मे मे के अदर
अपवित्र ने अदर ज़ुबान से भरपूर चुना है
असुर ने अदर कान से भरपूर सुना है
सास ने अदर ही भरपूर भुना है
दामाद तो बस भरपूर ही
भरपूर अदर बुना है
ओहो आखे तो रही गयी
भरपूर दिखती रहेगी
अपवित्रता सब को एक ही नज़र से देखती है
एक-एक बराबर वाले ही होते है
अपवित्रता बराबरी नही करती
उसमे क्या क्यो है
भरपूर का तो काम ही एक है
बुरा बान का भा()प
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