a gut ब्रह्माण्ड’ mother nature has to()tal _ap for wit_in chi_d
to br()ath , _rae, _est
an in()id total _est for out()id em()tee un()doing _est
a gut ब्रह्माण्ड’ mother nature has to()tal _ap for wit_in chi_d
to br()ath , _rae, _est
an in()id total _est for out()id em()tee un()doing _est
a y-0-s in()id u ri_ _no()le_ge _as no _espect for le_t()ver ac_now_edge
_oggy_ag in()id _otten _ag
_ill _eed to_or()ow _ize of _ap _ag
em()tee in()id thou_ht
u _ill ne_er _ae y-0
for y _ive g_d glo@
a ol_ess _ove is y-0-s in()id u s_ri_us bus-i_ess
th@ _ill or_er in()id chao_ com_& of
भरपूर ज़ुबान off()nces in_ess
0 so_ _ap-pi 2 dec()ive adhe
e_ail 0 gut ()_loat pre-v_il _ail
y-0-s in()id u su()ject g_o_
& 0 in()id u due_ f_o
आधे को सृष्टि गोदी क्या खैर खी खै-रात की बातां में मिली है जो
तूतू मे मे दुनिया के एक-एक भरपूर भाटा के ज्वर जाचेगा और
भरपूर नको को ख़ाली नाट्य नचायेगा
घर के अदर भरपूर मेहनत नहीं माती तो इसमें किसी
एक को एक ही क्या पायेगा
सानु की
y-0-s in()id u vo_can_ is _ancing 0 er_pting
जिस भरपूर जानकारी को पाकर तुमने हमें भूला दिया
ओह तो है सास के दामाद के एक-ज़ुबान की जान की भरपूर कारी
क्या टोड़ायेगी अदर भरपूर मल-भारी
पर तुम यह नहीं भूल सकते अंदर आ त्यारी
हमें सोना है हमें खाना है हमें गोदी में खेलना है
गोदी में है हम-आरी
हम तुम-हारे आज के आ(औ)भारी अहि आ
उचित गोदी जो अंदर ठीक समझे वही है संत()लन की ख़ाली ख़याली
तुम-हारी उर(या)जा है अदर उचा-लो या बाहर नीचे ब-हालो
सृष्टि गोदी काल जहीं ज़ाया धोने धाता ख़ाली खा(मा)या आधे बाल
सृष्टि गोदी की कोख में आधे अभी लाते तारनी तीख तहा ता
हाँ गोदी कोख ख़ाली आधे बाहर नहीं निका(ह)लेगी
ख़ाली सीख सही सा आधे जमन जही जोगा
ख़ाली खोज्या ख़याली खोला
जानी जो भरपूर डूबे उसे क्या कहते भरपूर भ-यानी
गोदी में द()बो दो दि()खो ख़ा()ली का()ना की का()नि
यकीन याया ()यानि
ख़ाली काल्कि के विचार है कहा दर्ज गोदी के ख़ाली धर्म उपचार फर्ज
आधे पुराण (हरि)आळी आर आधा प्राण पूरे पार
You must be logged in to post a comment.