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दिन का खाया रात ने निभाया
सफेरे साया दिखाया भाया
अब क्यो रोदे राम राया
पीठ पीछे सब ने खाया
तुम तो दामाद के घर की चार-दिवाली मे कैद हो
तुम्हे क्या नजर आती बाहर की बट्टिया
बजर-बट्टू नवाब के वैद हो
_ack 2 _qu_ar 1
देवी मन की बंद आँखों से सब देखती
इसी लिये गोदी में दिन दहाड़े
खुले-आम चोरी चोरी चाढे
रात कहा रह आयी आडे
तर-सती ताखे स-लाखे
सूखी धरती पे नहीं उगेगा अन्न
दूयीया के एक एक की भरपूर
कोख भी सूखी _a_ch भूख भरेगी
घर के अदर जन न भरपूर बाहर जन
कौन से समाज के मा-बाप को अपने
घर के अदर के बचो से उम्मीदे आती है
हाँ अंदर के बच्चे तो कभी बाहर निकलते ही नहीं
किसकी कैद में ही आधा जन्म जलते
जिसकी ()रथी आसमान से उडे
वह क्या ज़मीन के अंदर से गिरे
ढूढते रह आओगे भरपूर सिरसिले
कौन से आधा जन्म जान जय जले
सजना साज सुदर सालो सिले
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cu_i_osity of 1 _an’ lu_urious ci_y
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