कहती ज़ुबानी

भरपूर ज़ुबानी बान न मानी

मान मान के थक गयी कहती ज़ुबानी

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(कितने भांड रखे है लाल

()च्चो के ()च्छों में)

चलो थक कर बेहसोगे तो

दामाद भी ताजा हो जायेगा

पर यह क्या सास तो झुकी पड़ी है

झुकने को भी सस्ती घडी है

न भर भरपूर भद्दी भाड़ी भय भुड़ही है

सोने के ढोने

भरपूर के असली सोने के ढोने का

समाया तो अब है जाया

आखे भी न छुये ऐसा छख छहाया

इधर उधर ताके लेखा खुद लिखवाया

दिन दूर ढले ढाल को अंदर गिराया

अदर के बस में नही भरपूर किराया

अब क्या करेगा भरपूर है पूरा पाया

असली सोना तो अब गोदी का दिन भी देखेगा

भरपूर जब अंदर ही नीद का वास गवाया

राते लूटी घर का जेब का कतरा घर के

अदर ही सास काते कत कत कमाया

नीचे -तरता

बहुत फक्र यहसास है कि निवाला

गले से नीचे उतरता है भरपूर दुनिया में

एक भरपूर के (और सास के

दामाद उड़ता है )

गोदी में बुँदिया तो सूखी नींद सो रही है

भरपूर भी बहुत सुख पायेगा