हर सास वोह ज़हर है जो जरूरत से
ज्यादा या कम अदर
भरपूर है
हर सास वोह ज़हर है जो जरूरत से
ज्यादा या कम अदर
भरपूर है
रात को दिन बना रखा है और दिन मे ही बाहर निकलते है न
भरपूर दुनिया भी निकलेगी ब्रह्माण्ड की रात के अंदर
१-१ कलयुग मे ऐसा एक कही कई बार-बार को लेके आता है
तूतू मे मे की दुनिया की भरपूर रौशनी निकालती है
एक सास की _ic_tion को बाहर नही बैठने देता दामाद का
भरपूर i_er_i-a gut गोदी के अंदर
s’ood u _eel g(ut)odi’ _o()row
for भरपूर op_res_ion _ink in()id gut surface()all _ink
ac_ing em_tee nothing un()a-ranted
&
_eep _illing ever-y-thin_ भरपूर _ran-ted
do()s th@ _ap-pen in()id
no out()id
mae be in()id to b()ing out()id
ju_t _ea_e th() p()id
आधा बीमा()मुक्त करके आधे ने की ख़ाली
अंदर की भरपूर मज़बूरी नही पूरी पारी
आज के अंदर नही कमजोरी भरपूर है ख़ाली जोरा जोरी
साँस मे gut गोदी घुले ऐसी सुन्दर चोली की चाली चोरी
ब्रह्माण्ड भी खींचे लकीरे भोरी ख़ाली भोरी
ख़ाली धुन से धार धरे ख़ाली खतवाली
गोदी के कच्चे घरो मे भरपूर कीचड भा के
साफ करने की हिम्मत जात-पात की बीमा(या)रियो मे रखते है
और खुद के घरो के अदर भरपूर खीचड़ को हर
आधा जनम मे उछालते है
दामाद भरपूर भरना भी भरपूर आदत की
मज़बूरी बहुत ही कम(भरपूर)जोर होती हा
दगी की मौत म()ही
जिन जिन की सौत सही
घर मे आये एक वही
भरपूर का आयना यही
err-ing on y _ides are _afe-ly _ied in()id u p()id
ever-y1 are fo()l_o()ing in()id u s_ide
You must be logged in to post a comment.