कोई ना कोई

आप को कोई हरा नही सकता


क्यो


तो असुर क्या भरपूर पीला परते है


याद रखे


आप बहुत ही विश-all के भरपूर श(वे)श के अदर पूरे भरपूर वि()शेष है


भरपूर कार्य अदर ही अ()धा न()रेश है


अपवित्रता क्या अग्नि की भरपूर जलन को कम करती है

तो फिर किसे पवित्र भरपूर भड़काती है


काला चश्मा उतारते ही भरपूर बहुत साफ़ लिख रहा है ना

भरपूर-भरपूर-भरपूर

अपवित्र असुरो के आसू भरपूर बदलो की तरह

ज़ुबान की तूतू मे मे को भरपूर गर-जाते है

लेकिन ज़मीन पर नही गिरते


अपवित्रता की तो हमेशा चढ़ती कला भरपूर रहती है


इसी लिये रात भी भरपूर तड़पने की भरपूर बीमा(या)री ड()र-रोटी है
हा तो ख़ाली पा लो चोटी



अपवित्रता के अदर ही भरपूर आशा


अब असुर तो अभी की अभि-ला()षा


तेरी मेहनत की इधर उधर की लगन भी भरपूर है


इसी लिये अदर पवित्र 1-1 जरूर है

भरपूर दि-खा

बहुत ऊचा भाग्य है एक का तूतू मे मे के अदर


अपवित्र ने अदर ज़ुबान से भरपूर चुना है


असुर ने अदर कान से भरपूर सुना है


सास ने अदर ही भरपूर भुना है


दामाद तो बस भरपूर ही

भरपूर अदर बुना है

ओहो आखे तो रही गयी

भरपूर दिखती रहेगी

एक नज़र

अपवित्रता सब को एक ही नज़र से देखती है


एक-एक बराबर वाले ही होते है



अपवित्रता बराबरी नही करती


उसमे क्या क्यो है


भरपूर का तो काम ही एक है

बुरा बान का भा()प

(अ-श)कल

अक्ल क्या घास चरने गयी है


तू तू मे मे की शकल गोदी मे आती गाय है जिसे दुनिया का एक एक छू नही सकता


यह इज़्ज़त मिलती है गोदी को घरो के अदर


ज़ुबान की शकल दामाद से मैच करती है


मूह फेर भरने के हेर है

नुस्का पिरो

y-0-s की राक्षसी ख़ाली राज()मारी के क्यों नही खा पायी


चांदी की छड़ी को सुला दी
सोने की छड़ी को जगा दी


और फिर भरपूर घर के अदर आ के कहती


मुझे मनुष्य की गद आ रही है मे खायू

अब टेडी लात सीधी बतायो

मनुष्य को कभी राक्षसो की गध नही आयी


क्या लाते भी टेडी होती है


आधा जन्म का नुक्स पिरोती है