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Author: mandalalit
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ये-का
कला कायका अदर जायका
जो रुलाये रुत रोये रायका
जावो जाखे जिन्दरे जमायेका
न खुले ख्याल खूब खायेका
चट चाटा
सरपूर सासो सारनी सा
घर अंदर बिंदी विदाई वानी विचातानी
खट खायेगी खडपूर खमानी
खून खोलेगा खड़ा खुला ख़ि-तानी
तुम हारे मा-बाप को लापता
भरपूर भूतो का भूला भ्राता
और काली कर-तूतू लेकर आया छाता
१०० सर सड़ा इधर उधर एक रावन रटा राता
खुलेयाम खटी खोयी in_ent()it-y की इज़्ज़त
अदर की जाग(जग)रूकता चढ़ाने चढ़ने चो चहकती चा
ढलते ढलते
बाल बी बडपूर बहते
चाल चो चाली चीरते
हम तुम नही तोलते
अदर बहार अनमोल ढिढ़ोलते
बिंदी का बड़पूर बति()वास
घर के अदर हा-हा हा हा
और दफ(ना)तरो के अदर हाजी हाजी
कर्ज का कि-काह काजी काजी
रुजूल रेहा राम राम राजी
ਨਠ ਚਠ
ਮੇਰਾ ਸਮੇ ਸੋ ਗਯਾ
ਮੇਰਾ ਮੇ ਮਗ ਮੇਹਾ
ਜੇੜਾ ਜੇ ਜਾਗ ਜੇਹਾ
ਤੇਰਾ ਤੀ ਤਯਾਗ ਤੇਹਾ
ਇਧਰ-ਉਧਰ ਰਾਗ ਰੋਗ ਰਿਹਾ
ਜਾਨ ਜਾ ਜਾੜਾ ਜੋੜ ਜੇਹਾ
ਸਮੇ ਸੋੜਾ ਸਾੜਾ ਸਰਪੂਰ ਸੇਹਾ
यम-यम
घर के अदर सासो का नियम ख़ाली
इसका बल मत अदर का एक जाली
उचा उचा पोल पी पाले प्याली
गिराये घोर घोर घड़ियाली
हम-आरे पास क्या है जो तुम-हारे को
कर्ज का केखा करपूर कहलवायेगे
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y e*(@)empt _ol e_po_ering so f_ont s_unt
कौन कहता कोई कोई
आत्मज्ञान मे सांसे का ना कोई ऊँचा ना कोई बड़ा बोई
ख़ाली ज्ञान के प्रवाह मे अंदर आ सांसे शर्मसार सोई

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