गाठ-गुनी

परपूर पैसा पा पड़ा लरपूर लालच लूरा लड़ा

अदर-बाहर खचाखच खरपूर खोपड़ी खा खड़ा

गाठो को गट मे डुबाये दौड़ती द()रजा दा दड़ा

साथ मे इधर उधर को बिठाये बैठ बाया बड़ा

दो(गाठो)गुनी तरक्की पाये सास सरपूर सड़ा

भरपूर ब()बाद बू बरात

बाहर कलयुग का क्या हो यह तो सास के दामाद की

आखो को भरपूर भरा (इधर-उधर) भिखेगा

और gut के अदर का भरपूर कलयुग का काम-जाम

अदर ही गर()पूर गायेगा गाठो गा गमगीन गान

बाहर के अंदर

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सास की यह वह तो ठीक है इधर उध()र
पर y- -s का भरपूर भाठ-गाठ सामान तो
गोदी के अंदर ही छोड़ छे छ()हर छायोगे

आधा लाहर लुटा के अदर जा(सा)ली सास सलायोगे
मै मिया मी-ठू मरपूर मथायोगे
बाते बाते बाते ना ब(क)टे ब-राते

गू-का

ख़ाली मईया से मिल के भरपूर भच्छा मेहफ़ूज़ मुया म()चा
ख़ाली घर आप को भरपूर भोट भाद भी बही बिला या यीला न()चा
इस बात का बही बाया ()पका प()चा
आधा सका भरपूर भच्चा

आधे रुका
ख़ाली मा ना झुका
रहने दे घर भरपूर गू-का

खोटा खाह

सास को तो अगिननत दुनिया देखन का दाव
तो दामाद क्या खुद सास को अदर सुन साव
दुनिया भी तो दामाद को अपने हिसाब से अब ताव-हाव
घर के अदर तो फिर बहे बी भरपूर भाव

मु()खोटे कितने बेव(_oop)फ बोते बा
अनजान को जान के अंधा धुंध अदर लड़ते लाडे ला
और जब खुद को जान-ते जा जब जहा जा खोटा खाह

अदर आने का रास्ता अब साफ़ सा तो बाहर बाते भरी मौत के भार के मुह मे
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शरीर का क्या है
कश्टो की सतु(क)ष्टि तो धड़ को धोहि
शरीर तो सहा सही सुत जो ना लड़े तो लारपूर लुट

जब तुम-हारो ने सास के दामाद को अगिननत दुनिया की
हवा-ले हार हरा तो शरीर क्या साफ़ हम हरेंगे