भरपूर दि-खा

बहुत ऊचा भाग्य है एक का तूतू मे मे के अदर


अपवित्र ने अदर ज़ुबान से भरपूर चुना है


असुर ने अदर कान से भरपूर सुना है


सास ने अदर ही भरपूर भुना है


दामाद तो बस भरपूर ही

भरपूर अदर बुना है

ओहो आखे तो रही गयी

भरपूर दिखती रहेगी

एक नज़र

अपवित्रता सब को एक ही नज़र से देखती है


एक-एक बराबर वाले ही होते है



अपवित्रता बराबरी नही करती


उसमे क्या क्यो है


भरपूर का तो काम ही एक है

बुरा बान का भा()प

(अ-श)कल

अक्ल क्या घास चरने गयी है


तू तू मे मे की शकल गोदी मे आती गाय है जिसे दुनिया का एक एक छू नही सकता


यह इज़्ज़त मिलती है गोदी को घरो के अदर


ज़ुबान की शकल दामाद से मैच करती है


मूह फेर भरने के हेर है

नुस्का पिरो

y-0-s की राक्षसी ख़ाली राज()मारी के क्यों नही खा पायी


चांदी की छड़ी को सुला दी
सोने की छड़ी को जगा दी


और फिर भरपूर घर के अदर आ के कहती


मुझे मनुष्य की गद आ रही है मे खायू

अब टेडी लात सीधी बतायो

मनुष्य को कभी राक्षसो की गध नही आयी


क्या लाते भी टेडी होती है


आधा जन्म का नुक्स पिरोती है

उप-साज

भरपूर अपवित्रता अपने आप ही असुरो के अदर हरी जाती है


अपवित्र सरलता से परिवार की सस्कार भी भरपूर पवित्र धोते है


भरपूर सच मीठी बात है जो अदर अपवित्रता का घोल उपवास है

हमेशा से ही बिना पहचाने अदर छिपे राज अपवित्र पूजते साज