ठा ठा

मौत के मूह मे झोकते
तूतू मै मै का समाज क्या चौक-ते
घरो घडघूर दस्तक नही देता मोडते
एक एक मूह मे जय ज्योते


तुम तो हो वास की काली अधेरी रात
मे उडते रहो ठाठ की जात

चार चली खाली

चार दिन मे कमरा काली

चार दिन मे क्या होता है
जो एक रात मे नही होता
रात मे कोई एक कहा होता

सब पता होता
शाति बायी शख्सियत-शाली
मै हू इस कमरे की घर-वाली
भरपूर आधा बाहर रख-वाली
मै ही लाती आधा घर खुस(र)हाली

आधे गोदी में कहां निकला कहां वापस आया
इसका तो घर वालो ने अदर नही भरा किराया
अब ढूढते रहो इधर उधर करपूर कुया फिर आया