सृष्टि मईया की गोदी से छीन कर
असुरो को भरपूर भरते भा
घर के अदर भरपूर अज्ञानी
और बाहर भरपूर घर आ ज्ञानी
सृष्टि मईया की गोदी से छीन कर
असुरो को भरपूर भरते भा
घर के अदर भरपूर अज्ञानी
और बाहर भरपूर घर आ ज्ञानी
एक मूह बारह आखे
रह रह बजाये बुरा बाखे
काया करे तेरा सलाखे
मेरा जवाख अदर चाखे
बाहर डाले गले दाखे
के-शव के अनु-सार
शव है अदर सास के
अनु का भरपूर विस्तार
तुम हारा तो सब कुछ तू-तू से शुरू होता
और हारा से अत आयी आता
फस गया आत()डी मे माता
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अरे यह क्या सास मरा हुया अदर नही
मारा हुया १/२ बाहर बाटे
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क्यो कही के क()रो मे
तूतू मै मै की जूतियो
जा जायज जाज जय
मा-बाप को क्या
सारा समाज सिर
सुदर सारता सा
तुम-हारे मूह से पहला शब्द शिकस्त शाकाल शिकला
_un-ty @tac un()कल
फैला फिसला फूला फिसला
कलयुग का कार(गार)नामा
जब अदर नही पहनता ऊपर
तो बाहर क्यो दिखाये निचे का घर नगा नुपुर
क्यो कही ने पैदा किया
b_a(बर)bo_s
बाहर सामने आने के लिये अदर का बहाना
घर के अदर किसने सिखाया
हल्ला-हेरि हाहा ह(प)ढ़ाया
मा-बाप निशाना भरपूर बनाया
अरे देखो आधे कब्र से उभर आया
t_ink car()fu_ly be_or u let y-0-s _lay
1 _or_d _am & in()id 0s _ham s_ar
1 _or_d’ va_loos of 1 pri_ri_ies
_ho le out_pok c_oss a _in
_hi_ch t_ing 0 go y-1 _ae
0 _eat _ead ho_se
0 re=ent b_ing le_t out
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