छाप

गोदी की मिट्टी के ऊपर राख
फिर भी इधर उधर भरपूर आख
अदर उगलाये बाहर बा बिलख विलाप
सास भारी भरपूर आसू छी छाप

तुम अंदर हमें नहीं जानते
तूतू मे मे का मौन मानते
इधर उधर नही रहते जागते
याद के यारपूर यही त्यागते

ज़ुबान का भतीजा कब तक भत्तीसी के भान से जुये जुड़ायेगा

हमारी आत्मज्ञान का दुःख तो सास ने अदर ही भरपूर आधा बिछा बखा बा

भ()हाये

हमारी बिंदी सासे छीन छेती छा छत छे छुड़ानी छुया-छूत छडे छा
येसे ही तो ज़िन्दगी की बहार इधर-उधर भरपूर भसीन भरती भा


y-0-s ने ज़िन्दगी को जीत जरपूर जिया और अदर
तुम-हारी गरपूर गाठो गा तूतू तागा तिया

सासो के ज़माने का दिन-रात से सरपूर सनेहा लेना-देना
न लोटाये भरपूर बहाने बा भिखाना भहाये