ज़िन्दगी की श-रते सुबह को रगीन हो जाती है
दोपहर को सगीन सग आती है
शाम को भरपूर तक़रीर सुनाती है
राते भरपूर भर भर गम घोलती है
ज़िन्दगी की श-रते सुबह को रगीन हो जाती है
दोपहर को सगीन सग आती है
शाम को भरपूर तक़रीर सुनाती है
राते भरपूर भर भर गम घोलती है
यानि की एह लो
ख़ाली मान लो
ध्यान नहीं है
निकाल दो
आखे गम है
रुमाल लो
सर पे चढ़ा ले
बाल पहले गिरा लो
सारा कसूर जरूर तो भरपूर सास दवा(या)रा किया गया
वेदो की व्याखिया का भरपूर अनुशासन है
जब देखो _ast_ime * 2
अब सास को अपना _ast_i-me भी तो भरपूर प्यारा है
इसी लिये अदर ही व्याखिया का भरपूर नज़ारा है
बाकी तूतू मे मे की दुनिया जाये चाहे भरपूर एक झाड़ मे
मुझे तो अदर की पूरी ज़िन्दगी अपने आधा के साथ ही गुजारनी है
इस बात का पूरा यहसास है मुझे
उससे सृष्टि गोदी में जितनी सासे कड़ी होनी
है भरपूर खाद जाये
गोदी के दिन का आधा अंत होता देख सास को भरपूर चैन मिलता है
लेकिन दुनिया मे किसी एक का अंत अदर नही रात रोता
तो लय बाहर भार भरपूर भोता
और
अनंत रात को कभी न छूता
भरपूर सास के अदर का एक-एक का अंत ही
पूर्ण एकांत
सारा गोदी का ख़ाली सिध्दांत
आखे हुई पूरी मृतान्त
सृष्टि गोदी की ख़ाली शांति तो किसी को भी भरपूर सीख नही देती
फिर भरपूर सास को तो जरूरत भी नही है किसी भी आधा जन्म मे
तुमने क्या सोचा था विधा(वा)ता के लिखे हुये
भाग्य को अंदर ही ख़ाली मोड़ोगे
तुम तो आधा जन्म का उदय हुया
भरपूर अदर-बाहर बदलोगे
घर एक मन(का-भरपूर)दर होता है
जिसमे अदर का भरपूर वीर(य-ज)मान एक एक होता है
ਜਿੰਨੂ ਆਪਣੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਸਮਝ ਨਾ ਹੋਵੇ
ਉਹ ਬਾਹਰ ਦਾ ਲਿਖਯਾ ਪੜਾਇਆ
ਅੱਧਾ ਜਨਮ ਈ ਅੱਖਾਂ ਮੀਤ ਜਾਵੇਗਾ
ਤੇ ਅੰਦਰ ਦਾ ਸਿਖਣ ਆਇਆ
ਅੰਦਰ ਨੀ ਅੱਖਾਂ ਲਬਦਾ ਲਿਆਯਾ
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