मि(र)ची

घर की नज़र के बाहर तो भरपूर

मि()ची टाग राखी है

कान के छेद में क्यों नहीं डालते

आंखे तो बचाया ही लायेगी

कानो के छेद के अंदर

भरपूर भय के लिये

आ-स

तुछ मानस

मान सास फिर उपवास

तेरा दिखावा भरपूर वास

मा को लेके नस/नस का दास

गोदी के बाहर भरपूर जायेगा बिना त्रास

un-a-war

आधे बूंदियो के ख़ाली बैठने से कितनी जलन होती है भरपूर वेहले को


हर वक़्त gut सृष्टि को भरपूर नाम-आम (b_am )


आधे तो जैसे तो गोदी का भरपूर विनाश-व्या-कारन हो गया

लू-भाया

कहते है रोगी को बैठना नहीं आता


भिड़ता रोग भगाना भय भाता


इधर उधर एक नहीं इत-राता


इतना भी नहीं ध्याता


बैठा रोग भीतर मु-खोटे लुभाता