गोदी की मिट्टी के ऊपर राख
फिर भी इधर उधर भरपूर आख
अदर उगलाये बाहर बा बिलख विलाप
सास भारी भरपूर आसू छी छाप
तुम अंदर हमें नहीं जानते
तूतू मे मे का मौन मानते
इधर उधर नही रहते जागते
याद के यारपूर यही त्यागते
ज़ुबान का भतीजा कब तक भत्तीसी के भान से जुये जुड़ायेगा
हमारी आत्मज्ञान का दुःख तो सास ने अदर ही भरपूर आधा बिछा बखा बा
