आधे अपने अंदर आरा
हर युग में आधे
धूनी धन धाँसू धराहा धारा
आधे अपने अंदर आरा
हर युग में आधे
धूनी धन धाँसू धराहा धारा
हम तो बे()लब पत पा पान पकने पही पाते
फिर यह नाक बिना के कौन क्या किया काते
छोरी छथनी छा छल्ला तार ता तल तल्ला
1 c_ild is _rap()ped in 0s
_ut _ill _ur_ive t_ough 1 _ot
s_in-y out in()id _ar_rob _loat
+ _it fo_ward – 0 _ach_ard _ot
1 _or_d bot_ _ides + _it
1 co-in p_id ti_t
err& u
&
gre_er u
a _fi_al 1 de_ti_ation
0 _tar_ing in()id in_u_ir-y
_a_ring 1 _alt _ir-y
0 _no_ _h@ u wa_t _ir_y
0 rem_n_er th@
an_t_ing b_rn _ill
even_u-ally _ie
in()id o_d _ir 0 _y
0 _ad for di_i_all _it_s_u_t
ब()वास *_end हो गया
कलयुग के अदर
0 _urp_ised _un_er
सप्तऋषियों ने त्याग दिया था भोलेनाथ का दिया सारा ज्ञान
असुर १-१ को स()भाल से सखे सा
भरपूर उत्पादन सास-कर कलयुग के अदर
कर कुकता क्या का
आधे को पैदा अंदर करने का दुःख
और अंदर मारने का सुख
आधा सास भरपूर भूख
You must be logged in to post a comment.