ख़ाली आत्मज्ञान साँस के भीतर से सृष्टि गोदी के अंदर ही ख़ाली समाता है
बाहर की दुनिया का सीखा सास के अदर को भरपूर अपवित्र मे-ला ही भाता है
ख़ाली आत्मज्ञान साँस के भीतर से सृष्टि गोदी के अंदर ही ख़ाली समाता है
बाहर की दुनिया का सीखा सास के अदर को भरपूर अपवित्र मे-ला ही भाता है
सृष्टि गोदी की जुबां ख़ाली बरसती नहीं
इसी लिए हर सास भरपूर सती सही
हम मईया की ख़ाली आँखों में ही
काले-से-सफ़ेद-से-काले होते है
गोदी की आयने ख़ाली ही मजबूत होते है
सृष्टि को संजोए भीतर की धारे ही
ख़ाली साँस होते है
कहा है बिंदी का ख़ाली रास
इधर उधर
अंदर बाहर
भीतर एहसास
बलराम, सुभद्रा, नीलामणि को ख़ाली आधे मईया ही मिली
gut ब्रह्माण्ड के काल-रात्रि-युगा के भू के अंड में
देवो के ख़ाली देव
नंदी के महा-देव
चन्द्रमाँ का आधा सेव
ख़ाली पर्व की सती के सदैव
ख़ाली अन्तर(म)यानि है
भू के ख़ाली त्रिदेव
यानि की एह लो
ख़ाली मान लो
ध्यान नहीं है
निकाल दो
आखे गम है
रुमाल लो
सर पे चढ़ा ले
बाल पहले गिरा लो
गोदी के दिन का आधा अंत होता देख सास को भरपूर चैन मिलता है
लेकिन दुनिया मे किसी एक का अंत अदर नही रात रोता
तो लय बाहर भार भरपूर भोता
और
अनंत रात को कभी न छूता
भरपूर सास के अदर का एक-एक का अंत ही
पूर्ण एकांत
सारा गोदी का ख़ाली सिध्दांत
आखे हुई पूरी मृतान्त
सृष्टि गोदी की ख़ाली शांति तो किसी को भी भरपूर सीख नही देती
फिर भरपूर सास को तो जरूरत भी नही है किसी भी आधा जन्म मे
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