s_@ a_ar_ness
_hi_ch sta_e th@ _asking 1 is re-si_ing
sa_er u _et _ae y _la_er _out lo_d la_er
_o_
dun_in d_ink th@ de_i d_et d@ _ip
s_@ a_ar_ness
_hi_ch sta_e th@ _asking 1 is re-si_ing
sa_er u _et _ae y _la_er _out lo_d la_er
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dun_in d_ink th@ de_i d_et d@ _ip
0 stor_ache chan_ing
1 me_cy con_tant-ly
_leading _ang_ing
जुबान की जडपूर जात तो एक दूयीया
के अदर से भी-भी भरपूर बहुरि
दाग अच्छे है सफेदी सो सबाते सही
चौक चे चाक ची चिट्टिया चटाये
भरपूर सच की एक इज़्ज़त बाहर आती
और सौ गाठो के गठजोड को अदर कुरेदती
ख़ाली में क्या कम और क्या ज्यादा
भरपूर आदते मा-बाप नही बचपन से सिखाते
दूयीया के दाते दिखाते आखे खिलाते
और अदर भरपूर आ-वाज बहीखाते
पूजा की सासे कहा है कहे
गोल गोल पेट पे आस-पास
अच्छा तो फिर अदर कौन है
खू ले आम आधा किलो दो
बस इसके बाद-बम ने
ख़ाली दिन देखा ही ढैय्या ढो
भरपूर भेखा झोका झो
कौन है क्यो कही से बेहतर
तहि तरा तो तारा तुम-हारा
मेरे जैसा कस(आ)यी क्यो कही
जतेरे जैसा जाये जला जहि
भरपूर जहर पे भरपूर भेट
और ख़ाली खैर पे लात मारो पेट
आते दाल का दाव दालूम दया
उससे क्या
भरपूर को भाव ढूढना ढा ढढर
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