बस करो आधे
और नहीं वाह देह
gut गोदी को न मिला ख़ाली तेह
कौन भगाये भरपूर भय
रात-दिन न जगे ख़ाली लेह
आप ही करो ख़ाली मेह
बस करो आधे
और नहीं वाह देह
gut गोदी को न मिला ख़ाली तेह
कौन भगाये भरपूर भय
रात-दिन न जगे ख़ाली लेह
आप ही करो ख़ाली मेह
असुरो को घूंघट ओड़ के रखना चाहिये
gut गोदी के अंदर
उससे भरपूर आखे फट जाएगी
और घु-घट को भी पहाड देगी
जो भरपूर कड़वा बोलते है
वोह अदर बाहर के भरपूर को धोखा देते है
और जो मीठा बोलते है
वोह इधर उधर के भरपूर को
मीठे के सदवा में तोलते है
जहां सूर्य की रौशनी नहीं
वहां है gut गोदी का अँधेरा ढूंढे
अंदर की ख़ाली रोहिणी का
सफेरा
अब भरपूर ने राह तो निकल ही दी है
मिला देगा कल की
चाह से कौन छुपाये
भरपूर के इधर-उधर के वास्ते
y _ell-b()ing is
(he-s_e-we)al-thy
u-()odi-()ind
so th@ _hich is pa_t
_ill _eep b()ing out of
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कितने जन्मो के अंदर आधा
एक बलवान रहता है और
शुन्य जन्म में तो निर्बल ही मिलता है
शुन्य जन्म मिलता नहीं
gut गोदी के अंदर ख़ाली ढाल के
अपने आप शुन्य साँस
ढल जाता है
कोशिशे तो बहुत होती है
जीवन व्यतीत करने की
(व्यतीत क्या करेगा अतीत के अंदर
ढूंढते ढूंढते थैंक जायेगा)
पर क्या करे
पहली बात भरपूर तो नाकाम है
और पहली बात भरपूर तो व्यस्त
है तलवे चरने में
अब एह लात तो सीधी है
कोशिश के अंदर भी सीधा निकला
बाहर भी सीधा
टेढ़ी कोशिश काम नहीं देखती
फिर भरपूर ने कोशिश की
रेखा को कब देखा
असुरो का अधर्म भरपूर भय आ अंदर भय-भीत भरपूर बहाव बाहर बहा
हाथी जंगल में अकेले ही चलता है
इसी लिए भार का च-लान आसान ख़ाली होता है
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