आज की पडपूर पुस्तक
कल की दरपूर दस्तक
अदर न मिली फ़ुरसत
भिन भिनाये अदर बाहर
भिक्षुक की रद रुक्सत
Category: hohm
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आधा जन्म सास
खुद के अदर मारने के लिये शूद्र
बिंदु के लिए ब्राहमन न बना मुग्ध
बचे जो काटे क्षत्रिय जडपूर जाटे
न जताये प्यार वैश्य मरा मार माटे
वाद
गुरूजी का आशी()वाद
सुनाये नही
अदर मा का अनु(अंतिम)वाद
जल्दी जला
हमें तो कुछ-कुछ समझ सारा
यह शाति बायी क्यो उकसा रहा
हमें ही घर से बाहर निकलवा अहा
इस के तो काल के अदर कूडा काला
बहुत कुछ मिल—-भगत सगता साला
घर है दगना उछाल जल्दी वाला जाला
इसने सब है घर के अदर पता लिया
हम क्या करते है हर रोज पिया
देखे ध्यान से धार न धरे दिया
क्या उपाये है अंदर जिया
घर का मालिक ही न सुने
अनसुने आधे ध्यान धिया
त्यार तरो
हमें तो करनी है गोदी की ज़मीन हरी
जो भी इसमे आया करपूर करमो का कमाया
भरपूर भय से भूरा भाया
हमें मोह-माया के ख़ाली ने समझाया
अब आन से है लड़ना घर के अदर झडना
कैसे कहे कितना कम कहा करना
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so u wa_ch su_set ever_dae _oing res_
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आधा आधे
दो लफ्जो की है गोदी की ख़ाली अहा-आणि
इसमें न कोई राजा न रानी तोपफानी
आधा दिन ध्यानी आधे रात रूहानी
दिन रात आसमान आम भवानी
आ लेले ख़ाली खज़ा खवानी
न था, है, रहेगा
बिना सोचे ही भरपूर भानुमान
गोदी के आधे का ख़ाली ध्यान
दूयिया के अदर नही है निशान
क्यो कही के पास नही है
ख़ाली ज़मीन का आसमान
आधे हरीआली गोदी आन

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