मंथन-निशानी

असुरो और बूंदियो के बीच में मंथन


सृष्टि गोदी का अमृत पूर्ण समर्पण


काल रात्रि है मधानी का सारा दर्पण


और आधे बैठा है निचे ध्यानी


नीलपंथ अभी हुआ अंदर का ज्ञानी


कब ख़तम हो कलयुगा की भरपूर निशानी

_प

आधे की ख़ाली आंखे श्राप है


अपवित्र असुर अदर के बाप है


इधर उधर के भरपूर आप है


बिन मा के बचे अदर के पाप है

आधे की ख़ाली ज़ुबान की साधना के अ()लाप है

सहज

भरपूर सास के भरपूर दामाद के पास सब कुछ भरपूर है

बस नहीं है तो अच्छी in()id gut ख़ाली प्रकृति

जिससे सृष्टि गोदी के सुर अंदर ख़ाली सहज रहते है

_जा _जा

सृष्टि गोदी में भरपूर ज़ुबान के ताले की चाबी को रजा नहीं मिलती


और फिर तूतू में में की 1 दुनिया तो भरपूर सास के दामाद की सजा पर ही टिकी है न


तो फिर काली माता की बाहर दरशाती लम्बी ज़ुबान का कोई लेना देना नहीं है गोदी से


यह तो भपूर दुनिया की बनायीं हुई दाती है जो भरपूर को असीसे देती है


8 _ill_on धढ़ कैसे टिक गये काली माता के गले में


और भरपूर का निवाला गले से नहीं उतरता