कलियुगे के कल-मनुष्य का आज-कल भविष्य (भाव-विष-यय)
भरपूर गाठो का एक-एक अदर शिष्य
1 wor_d f_ea_ur is _ooking b_ite उद्देश्य
कलियुगे के कल-मनुष्य का आज-कल भविष्य (भाव-विष-यय)
भरपूर गाठो का एक-एक अदर शिष्य
1 wor_d f_ea_ur is _ooking b_ite उद्देश्य
गोदी सांसो को दो()का दही दाती
आधे आली आतुर अभी आया आती
आत्मा के अच्छे-सच्चे सह सही सकते
अच्छी आदतों की भरपूर नुमा(फर-मा)ईश नाती नहीं नकते
तुम-हारे तू को घर के अंदर ख़ाली रसूल के असूल का नहीं पता
हमें क्या करना तुम-हरी भरपूर इधर उधर भरपूर सास के दामाद द-खता
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अब सृष्टि गोदी में मईया ने खुद बाल शुनया बिंदु
को माखन खाने खो खिला ख़हे खा
तो भरपूर भ()ल-ज़ाम तो सास की तूतू मे मे ने
अपना भरपूर सिद्ध करने के लिए लगाए ला
अब इस सास सो सदगे इधर-उधर के ख़ाली डंडे
ना भूले भाली भेहेर अदर-बाहर भरपूर भंडे
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y-0-s in()id u की ज़ुबान का खूले(आ)आम सरपूर साड़ा
तूतू मे मे से लड़े लरपूर लारू लाड़ा
दिन-रात एक आरे-आ-अदर भीड़े भाड़ा
जो लड़े सो मरे न उतरे क्रीड़ा करपूर काड़ा
0 दर-डर
घर के अदर एक एक का मुह-खोटा भरपूर उजारड़ते आ और
बाहर उजड़े हुयो हा एक-एक मुखौटा भरपूर पहनते पा
अदर एक एक के ऊपर पूरा _go _ub झाड़ते झा
और बहार एक एक से डरने के हज़ार मुखोटे अदर मुह छुपाते छा
ठेके
भरपूर सास ठेके तूतू मे मे समाज सेके
और भरपूर भौ()त गोदी के भरपूर भेके
यह क-मायी तो भरपूर भधायी आधा जन्म जाड़ा जेके
दिन में न भरपूर मौत से डरे
इसी लिए सास रात को ही भरपूर सर सड़े
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cause & effect
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0 awa-y-er
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अकलिष्ठा-कलिष्टा
0 _ol _ain_ul
वैराग्य ख़ाली वही वि-योग अदर भरपूर भाग्य
un_olor 2 em_tee _ull 0 co_or
तुम-हारे अपने अदर आधा जन्म की सास दगी भरपूर भर डकैत डाके
फिर दमाद तो भूले भटके भाटा के ज्वार जाके उचा आखे
ठाठ बाठ पूरे आठ
अदर भिड़े भरपूर जूठे जाठ
भात भात के भिरे नर नाठ
धरो भरपूर धत धत धेरे धुली धाठ
पढ़ाई का बल मत पढ़()आई
और सास का दामाद कहा गया है धरने
i को बाहर खरीदने खैर खाते
भरपूर भक भर अदर भय-लाते
एक-एक ना समझ बाहर बाते
पूरे पैर पड़े ना इधर उधर प()ते
परपूर पढ़ पिगला गला गाते
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