निकल गया

स-पनो के अंदर भरपूर पसीना नहीं बहाता


सीना भी तो सेना को एक प से मिलाता


तभी दिन भी सपना बन कर निकल जाता


भरपूर फल मन-तर मुग्ध देखे मस्य का मल निकल जाता

असमय

भरपूर न तो बाहर के मुह की रखता है और न ही अदर के मुह की


भरपूर की अकल तो मंद मंद है


इसी लिए इधर उधर अकलमंद आ