जल्दी जला

हमें तो कुछ-कुछ समझ सारा
यह शाति बायी क्यो उकसा रहा
हमें ही घर से बाहर निकलवा अहा
इस के तो काल के अदर कूडा काला
बहुत कुछ मिल—-भगत सगता साला
घर है दगना उछाल जल्दी वाला जाला
इसने सब है घर के अदर पता लिया
हम क्या करते है हर रोज पिया
देखे ध्यान से धार न धरे दिया
क्या उपाये है अंदर जिया

घर का मालिक ही न सुने
अनसुने आधे ध्यान धिया

त्यार तरो

हमें तो करनी है गोदी की ज़मीन हरी

जो भी इसमे आया करपूर करमो का कमाया
भरपूर भय से भूरा भाया

हमें मोह-माया के ख़ाली ने समझाया

अब आन से है लड़ना घर के अदर झडना
कैसे कहे कितना कम कहा करना

न था, है, रहेगा

बिना सोचे ही भरपूर भानुमान

गोदी के आधे का ख़ाली ध्यान

दूयिया के अदर नही है निशान
क्यो कही के पास नही है

ख़ाली ज़मीन का आसमान
आधे हरीआली गोदी आन

तड़प तड़प ताल

भरपूर शक की नज़र नही जानती
गोदी के हक की कदर
आसमान नही गिरता जमीन नही रूकती
तब तक ख़ाली रात की रूह रही भटकती

एक-एक सास की खबर लेगा
काल का हिसाब किताब करेगा
गोदी की मिट्टी के लिये लड़ेगा
दूयिया जमीन जर्रा जर्रा डरेगा

a _or_d _as no g_oun_

& tim is ru_ning _out f_own

to kee_ up _heck wit_out to_n