भव्य भूल

दुनिया के नेक एक को किसने देखा चुलु भर तूतू मे मे तानी मे भरपूर डूबते डा
जरपूर जुबान जे जेखा-तेखा तभी तो तीखा तरपूर तोखा

गाठो का अदर अनुभव
ना देखा दिन-रात का भरु भरपूर भव

बे-तुके सवालो की जु-बान बिछाये अदर-बाहर जरपूर जाल
न तोड़े तिसे तक तदर तरपूर ताल

Published by

Unknown's avatar

mandalalit

to be a within 0-one-0 is to breathe for gut alone total mother nature

Leave a comment