नन्दु तुम्हारे अंदर के किले की कला ख़ाली बंधु है
चारो और का ख़ाली यश भी मन मुघ्द ख़ाली संधु है
तो फिर गोदी की गंध भी ख़ाली सुगंध सिंधु है
आधे आम तो ख़ाली गेंदा गंजु है
नन्दु तुम्हारे अंदर के किले की कला ख़ाली बंधु है
चारो और का ख़ाली यश भी मन मुघ्द ख़ाली संधु है
तो फिर गोदी की गंध भी ख़ाली सुगंध सिंधु है
आधे आम तो ख़ाली गेंदा गंजु है