जुबान की जडपूर जात तो एक दूयीया
के अदर से भी-भी भरपूर बहुरि
जुबान की जडपूर जात तो एक दूयीया
के अदर से भी-भी भरपूर बहुरि
दाग अच्छे है सफेदी सो सबाते सही
चौक चे चाक ची चिट्टिया चटाये
भरपूर आदते मा-बाप नही बचपन से सिखाते
दूयीया के दाते दिखाते आखे खिलाते
और अदर भरपूर आ-वाज बहीखाते
पूजा की सासे कहा है कहे
गोल गोल पेट पे आस-पास
अच्छा तो फिर अदर कौन है
खू ले आम आधा किलो दो
बस इसके बाद-बम ने
ख़ाली दिन देखा ही ढैय्या ढो
भरपूर भेखा झोका झो
कौन है क्यो कही से बेहतर
तहि तरा तो तारा तुम-हारा
मेरे जैसा कस(आ)यी क्यो कही
जतेरे जैसा जाये जला जहि
भरपूर जहर पे भरपूर भेट
और ख़ाली खैर पे लात मारो पेट
आते दाल का दाव दालूम दया
उससे क्या
भरपूर को भाव ढूढना ढा ढढर
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0_ing lo_s in()id _ible
भरपूर भा()या के दुयिया-वी जन जन
गिराये अदर तन तेरा मन मेरा मन
तन के जोड
उम्र के भरपूर निचोड
कहा कहाय
अदर के बहार
_ur-f *cel
दाग दुया दाते दया दबाते
_evi fi_k_
नेको नही नोडो निच जन जच
खूबसूरत ख्याल के बाल ना सि-राये सडपूर स्याल
स्वा साब सिठायेयीये और सब सुलह पायेयीये
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