कब तक आँखों के पीछे भरोगे
भरे हुए भी इधर उधर रोज पड़ेंगे
जो सामने आता भीतर भिड़ेंगे
इसी लिए तो
सीधा हे मानो
अंदर जाम ख़ाली खेलेंगे
कब तक आँखों के पीछे भरोगे
भरे हुए भी इधर उधर रोज पड़ेंगे
जो सामने आता भीतर भिड़ेंगे
इसी लिए तो
सीधा हे मानो
अंदर जाम ख़ाली खेलेंगे