अपवित्र असुरो के आसू भरपूर बदलो की तरह
ज़ुबान की तूतू मे मे को भरपूर गर-जाते है
लेकिन ज़मीन पर नही गिरते
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अपवित्रता की तो हमेशा चढ़ती कला भरपूर रहती है
इसी लिये रात भी भरपूर तड़पने की भरपूर बीमा(या)री ड()र-रोटी है
हा तो ख़ाली पा लो चोटी
अपवित्रता के अदर ही भरपूर आशा
अब असुर तो अभी की अभि-ला()षा
तेरी मेहनत की इधर उधर की लगन भी भरपूर है
इसी लिये अदर पवित्र 1-1 जरूर है
