भरपूर-भरपूर-भरपूर

अपवित्र असुरो के आसू भरपूर बदलो की तरह

ज़ुबान की तूतू मे मे को भरपूर गर-जाते है

लेकिन ज़मीन पर नही गिरते


अपवित्रता की तो हमेशा चढ़ती कला भरपूर रहती है


इसी लिये रात भी भरपूर तड़पने की भरपूर बीमा(या)री ड()र-रोटी है
हा तो ख़ाली पा लो चोटी



अपवित्रता के अदर ही भरपूर आशा


अब असुर तो अभी की अभि-ला()षा


तेरी मेहनत की इधर उधर की लगन भी भरपूर है


इसी लिये अदर पवित्र 1-1 जरूर है

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mandalalit

to be a within 0-one-0 is to breathe for gut alone total mother nature

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